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GLOBAL ELECTORAL INFRASTRUCTURE, FOREIGN ASSISTANCE, AND DEMOCRATIC TRUST:USA 2020

वर्ष 2020 का अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव आधुनिक लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे अधिक विवादित घटनाओं में से एक के रूप में वर्णित किया गया। यह केवल दो प्रत्याशियों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा नहीं थी, बल्कि संस्थागत विश्वास, प्रौद्योगिकी, वैश्विक वित्तपोषण और सूचना-युद्ध के जटिल अंतर्संबंधों का परीक्षण भी था। लोकतंत्र को सामान्यतः जन-संप्रभुता का सर्वोच्च रूप माना जाता है, किंतु जब चुनावी प्रक्रिया में डिजिटल अवसंरचना, अंतरराष्ट्रीय परामर्श संस्थाएँ, विदेशी सहायता एजेंसियाँ और निजी प्रौद्योगिकी कंपनियाँ सम्मिलित होती हैं, तब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और संप्रभुता का वास्तविक संरक्षक कौन है। 2020 के चुनाव के संदर्भ में “चुनावी धांधली कार्टेल” जैसी अभिव्यक्तियाँ राजनीतिक विमर्श में उभरीं, जिनमें यह आरोप लगाया गया कि वैश्विक चुनाव प्रबंधन नेटवर्क, अमेरिकी करदाताओं के धन, और इलेक्ट्रॉनिक मतदान तकनीकों के माध्यम से चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। यद्यपि इन आरोपों का न्यायालयों में निर्णायक प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया, तथापि इनसे उत्पन्न अविश्वास ने लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर गहरा प्रभाव डाला।


इसी व्यापक संदर्भ में 2013 में स्थापित “एसोसिएशन ऑफ वर्ल्ड इलेक्शन बॉडीज़” (A-WEB) का उल्लेख किया जाता है, जिसकी स्थापना दक्षिण कोरिया के राष्ट्रीय चुनाव आयोग के तत्वावधान में हुई। A-WEB स्वयं को चुनावी प्रबंधन संस्थाओं का वैश्विक मंच बताता है, जिसका उद्देश्य तकनीकी सहयोग, प्रशिक्षण और “श्रेष्ठ प्रथाओं” का आदान-प्रदान है। इसके 100 से अधिक सदस्य देश हैं, और यह इलेक्ट्रॉनिक मतदान प्रणालियों, केंद्रीय सर्वरों तथा चुनावी प्रशासनिक क्षमता निर्माण के कार्यक्रमों में सहयोग प्रदान करता है। अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय विकास एजेंसी (USAID) तथा इंटरनेशनल फाउंडेशन फॉर इलेक्टोरल सिस्टम्स (IFES), नेशनल डेमोक्रेटिक इंस्टिट्यूट (NDI) और इंटरनेशनल रिपब्लिकन इंस्टिट्यूट (IRI) जैसे संगठनों के साथ इसके समझौता ज्ञापन यह दर्शाते हैं कि चुनावी सहायता एक वैश्विक नीति-उपकरण के रूप में प्रयुक्त होती है। अमेरिकी विदेश सहायता प्रतिवर्ष अरबों डॉलर के स्तर पर वितरित होती है, जिसमें चुनावी प्रशासन को सुदृढ़ करने हेतु वित्तीय और तकनीकी समर्थन भी सम्मिलित है।परंतु तकनीकी सहायता और राजनीतिक प्रभाव के मध्य की रेखा अत्यंत सूक्ष्म होती है।


राजनीतिक विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विद्वानों ने इसे “लोकतांत्रिक प्रोत्साहन” और “नरम शक्ति” (soft power) की श्रेणी में रखा है, जहाँ चुनावी अवसंरचना में निवेश के माध्यम से वैचारिक प्रभाव स्थापित किया जा सकता है। उदाहरणार्थ, फिजी, अर्जेंटीना, एल साल्वाडोर, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, इक्वाडोर, रोमानिया, किर्गिस्तान और इराक जैसे देशों में इलेक्ट्रॉनिक मतदान प्रणालियों के क्रियान्वयन के पश्चात विवाद उत्पन्न हुए। इराक (2018) में इलेक्ट्रॉनिक मशीनों के उपयोग के बाद पुनर्गणना की मांग उठी और संसद ने मैनुअल ऑडिट का आदेश दिया। कांगो (2018) में इलेक्ट्रॉनिक टचस्क्रीन मशीनों के प्रयोग के पश्चात व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। किर्गिस्तान (2020) में चुनावी परिणामों के विरोध में आंदोलन हुए और चुनाव रद्द कर दिए गए। इन घटनाओं को कुछ विश्लेषकों ने तकनीकी अपारदर्शिता, साइबर-सुरक्षा की कमी और संस्थागत अविश्वास का परिणाम बताया।


चुनावी प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्यरत कंपनियों—जैसे मिरु सिस्टम्स, स्मार्टमैटिक और डोमिनियन वोटिंग सिस्टम्स—को लेकर भी विवाद उत्पन्न हुए। मिरु सिस्टम्स, दक्षिण कोरिया की एक कंपनी, ने इराक और कांगो में बड़े अनुबंध प्राप्त किए। 2018 में A-WEB के तत्कालीन महासचिव पर रिश्वत संबंधी जांच की खबरें आईं, यद्यपि उन्हें दोषमुक्त कर दिया गया। यह घटना इस तथ्य को रेखांकित करती है कि चुनावी प्रौद्योगिकी के वैश्विक बाज़ार में पारदर्शिता और नियामक निरीक्षण की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण है।


स्मार्टमैटिक, जिसकी स्थापना वेनेज़ुएला में हुई और जिसका संचालन विभिन्न देशों में फैला है, ने फिलीपींस तथा अन्य देशों में चुनावी मशीनें उपलब्ध कराईं। 2023 में फिलीपींस से संबंधित एक अनुबंध में कथित रिश्वत प्रकरण के कारण इसके कुछ अधिकारियों पर अभियोग दायर हुए। डोमिनियन वोटिंग सिस्टम्स, एक कनाडा-अमेरिकी कंपनी, 2020 के अमेरिकी चुनाव के पश्चात व्यापक सार्वजनिक बहस का केंद्र बनी। अनेक न्यायालयों ने चुनावी धांधली के आरोपों को साक्ष्य के अभाव में अस्वीकार किया, किंतु मानहानि संबंधी मुकदमों—जैसे एक प्रमुख मीडिया कंपनी के साथ 787 मिलियन डॉलर का समझौता—ने यह स्पष्ट किया कि सूचना-प्रसार और तकनीकी आरोप किस प्रकार वित्तीय और संस्थागत परिणाम उत्पन्न कर सकते हैं।


चुनावी प्रणालियों के डिजिटलीकरण ने पारंपरिक मतपत्र प्रणाली की तुलना में गति और दक्षता प्रदान की है, परंतु इसके साथ साइबर-सुरक्षा, सोर्स कोड पारदर्शिता, आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा, और स्वतंत्र ऑडिट जैसे वैज्ञानिक प्रश्न भी जुड़े हैं। कंप्यूटर विज्ञान के शोध में यह सिद्ध किया गया है कि किसी भी नेटवर्क-संपृक्त प्रणाली में “अटैक सरफेस” (attack surface) विस्तृत हो सकता है, विशेषकर जब केंद्रीय सर्वर, क्यूआर कोड, वायरलेस संचार या रिमोट अपडेट जैसी सुविधाएँ सम्मिलित हों।

इसी कारण कई विशेषज्ञ “वोटर-वेरिफायबल पेपर ऑडिट ट्रेल” (VVPAT) की अनिवार्यता पर बल देते हैं, जिससे इलेक्ट्रॉनिक परिणामों का भौतिक सत्यापन संभव हो सके।जो सिर्फ़ भारत जैसी उन्नत लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही संभव हो पाया है।

USAID की भूमिका पर भी बहस हुई है। यह एजेंसी लोकतांत्रिक संस्थाओं को सुदृढ़ करने, चुनावी पर्यवेक्षण, और विधिक सुधारों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती है। समर्थकों का तर्क है कि यह अधिनायकवादी प्रभावों का प्रतिरोध करने का माध्यम है; आलोचकों का कहना है कि इससे संप्रभु देशों की आंतरिक राजनीति पर बाहरी प्रभाव बढ़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय संबंध सिद्धांत में इसे “हस्तक्षेप बनाम सहयोग” के द्वंद्व के रूप में देखा जाता है। 50 अरब डॉलर से अधिक की वार्षिक अमेरिकी विदेश सहायता में चुनावी कार्यक्रम एक अंश मात्र हैं, परंतु राजनीतिक प्रतीकात्मकता के कारण वे विवाद का केंद्र बन जाते हैं।


2020 के अमेरिकी चुनाव के संदर्भ में, 60 से अधिक न्यायिक निर्णयों में व्यापक धांधली के आरोपों को अस्वीकार किया गया। साइबर सुरक्षा और अवसंरचना सुरक्षा एजेंसी (CISA) ने इसे “अमेरिकी इतिहास का सबसे सुरक्षित चुनाव” कहा। फिर भी, एक बड़े वर्ग में अविश्वास बना रहा। यह परिघटना सामाजिक मनोविज्ञान और सूचना-प्रसार के अध्ययन का विषय है—जहाँ एल्गोरिदमिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, दुष्प्रचार (disinformation), और राजनीतिक ध्रुवीकरण मिलकर वैकल्पिक वास्तविकताओं का निर्माण करते हैं।


वैश्विक स्तर पर, चुनावी तकनीक का निर्यात एक उभरता हुआ उद्योग है, जिसकी वार्षिक आय अरबों डॉलर में आँकी जाती है। परंतु तकनीकी दक्षता तभी लोकतांत्रिक वैधता में परिवर्तित होती है जब पारदर्शिता, स्वतंत्र निरीक्षण, बहुदलीय सहमति और सार्वजनिक विश्वास मौजूद हों। यदि नागरिकों को यह अनुभव हो कि चुनावी प्रक्रिया “ब्लैक बॉक्स” बन गई है, तो चाहे वास्तविक धांधली सिद्ध न हो, लोकतंत्र की वैधता संकटग्रस्त हो सकती है।


इस प्रकार “वैश्विक चुनावी कार्टेल” की धारणा को वैज्ञानिक दृष्टि से परखना आवश्यक है। अब तक उपलब्ध प्रमाण व्यापक अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र की पुष्टि नहीं करते, परंतु वे यह अवश्य संकेत देते हैं कि चुनावी अवसंरचना का वैश्वीकरण, निजीकरण और डिजिटलीकरण नए जोखिम उत्पन्न करता है और विश्व के डिजिटल लोकतांत्रिक देशों को भारत से अवश्य सीखना होगा की तकनीक और नैतिक मूल्यों के आधारपर एक निष्पक्ष चुनाव परिपूर्ण किया जा सकता है । समाधान आरोपों की पुनरावृत्ति में नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार, पारदर्शी अनुबंध, स्वतंत्र साइबर ऑडिट, ओपन-सोर्स निरीक्षण, और अंतरराष्ट्रीय मानकों की स्पष्ट परिभाषा में निहित है।


लोकतंत्र का भविष्य तकनीक के परित्याग में नहीं, बल्कि उसके विवेकपूर्ण और उत्तरदायी उपयोग में है। यदि विदेशी सहायता कार्यक्रमों को संप्रभुता-सम्मान, स्थानीय क्षमता निर्माण और कठोर निगरानी के सिद्धांतों के साथ लागू किया जाए, तो वे लोकतंत्र को सुदृढ़ कर सकते हैं। किंतु यदि पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव हो, तो वही कार्यक्रम संदेह और असंतोष को जन्म दे सकते हैं। अतः आवश्यक है कि वैश्विक चुनावी सहयोग को वैज्ञानिक मानकों, विधिक उत्तरदायित्व और सार्वजनिक संवाद के साथ पुनर्संतुलित किया जाए, जिससे मतपेटी पुनः विश्वास का प्रतीक बन सके, न कि अविश्वास का।



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