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“राक्षसों का समय” या विचारों का भ्रम: ग्राम्शी

आज की वैश्विक परिस्थिति में जब पुराने राजनीतिक ढाँचे दरकते दिखाई दे रहे हैं और नई व्यवस्थाएँ स्पष्ट रूप से आकार नहीं ले पा रहीं, तब एक कथन बार-बार उद्धृत किया जा रहा है कि “पुरानी दुनिया समाप्त हो रही है और नई दुनिया जन्म लेने के लिए संघर्ष कर रही है, यही राक्षसों का समय है।” इस वाक्य को इतालवी विचारक एंतोनियो ग्राम्शी से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है, मानो उन्होंने ही वर्तमान अराजकता का पूर्वानुमान कर लिया हो। किंतु सत्य यह है कि ग्राम्शी ने इस रूप में न तो “राक्षसों का समय” लिखा और न कहा। उनके मूल इतालवी वाक्य में “अंतराल” के दौरान उत्पन्न होने वाले “रोगग्रस्त लक्षणों” की बात थी, जिसे बाद के अनुवादों और वैचारिक पुनर्रचनाओं ने एक आकर्षक लेकिन भ्रामक रूप दे दिया। यह परिवर्तन स्वयं इस बात का उदाहरण है कि किस प्रकार मार्क्सवादी परंपरा में भाषा को प्रतीकात्मक हथियार बनाया जाता है, ताकि जटिल ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को भावनात्मक नारों में बदला जा सके।


ग्राम्शी को 1926 में इतालवी फासीवादी शासन ने कारावास में डाल दिया था। जेल में रहते हुए उन्होंने अनेक नोटबुक्स में राजनीति, दर्शन और भाषा पर अपने विचार लिखे। उनका उद्देश्य यह समझना था कि इटली में समाजवादी क्रांति क्यों नहीं हो सकी और किस प्रकार सत्ता केवल बल प्रयोग से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रभुत्व के माध्यम से भी कायम रहती है। उन्होंने “हेजेमनी” की अवधारणा दी, जिसके अनुसार शासक वर्ग शिक्षा, मीडिया, साहित्य और सामाजिक संस्थाओं के जरिए समाज की चेतना को प्रभावित करता है। यहीं से आधुनिक वामपंथी सांस्कृतिक राजनीति को वैचारिक आधार मिला। परंतु इसी सिद्धांत ने आगे चलकर समाज को वर्ग-संघर्ष के स्थायी चश्मे से देखने की प्रवृत्ति भी मजबूत की, जहाँ हर सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को सत्ता बनाम प्रतिरोध के द्वंद्व में बाँध दिया गया।


समस्या यह है कि “राक्षसों का समय” जैसा कथन ग्राम्शी की सूक्ष्म ऐतिहासिक समझ को एक सनसनीखेज रूप में बदल देता है। मूल पाठ में उन्होंने जिस “रोगग्रस्त स्थिति” की बात की थी, वह सामाजिक संक्रमण की जटिलता को दर्शाती थी, न कि किसी अलौकिक दैत्य के उदय को। किंतु समकालीन राजनेता, बुद्धिजीवी और प्रभावशाली वक्ता इस वाक्य को ऐसे प्रस्तुत करते हैं मानो वर्तमान विश्व-व्यवस्था स्वयं किसी भयावह दानव द्वारा संचालित हो। यह दृष्टिकोण जनमानस में निराशा और आक्रोश को बढ़ाता है, पर समाधान की दिशा में ठोस विचार नहीं देता। मार्क्सवादी विमर्श में अक्सर संकट को अनिवार्य ऐतिहासिक चरण के रूप में चित्रित किया जाता है, जिससे क्रांति की आवश्यकता सिद्ध की जा सके। इस प्रकार संकट का बौद्धिक विश्लेषण कम और वैचारिक उपयोग अधिक होता है।


ग्राम्शी की रचनाएँ द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद प्रकाशित हुईं और धीरे-धीरे विश्वभर में फैल गईं। 1960 और 70 के दशक में यूरोप के छात्र आंदोलनों और वामपंथी समूहों ने उनके सांस्कृतिक प्रभुत्व के सिद्धांत को अपनाया। ब्रिटेन में कुछ समाजशास्त्रियों ने इसे उस समय की रूढ़िवादी राजनीति की आलोचना के लिए प्रयोग किया। विडंबना यह है कि बाद में यूरोप के दक्षिणपंथी विचारकों ने भी इसी सिद्धांत को अपनाकर सांस्कृतिक पहचान की राजनीति को नया रूप दिया। इससे स्पष्ट होता है कि ग्राम्शी की अवधारणाएँ वैचारिक रूप से लचीली थीं और उन्हें विभिन्न दिशाओं में मोड़ा जा सकता था। किंतु यह भी दिखाता है कि मार्क्सवादी ढाँचा स्वयं स्थायी समाधान देने के बजाय सत्ता-संघर्ष की नई व्याख्याओं को जन्म देता रहा।


“राक्षस” रूपक की लोकप्रियता यह संकेत देती है कि आज की राजनीति में भावनात्मक भाषा तर्क से अधिक प्रभावशाली है। जब किसी नेता या व्यवस्था को “राक्षस” कहा जाता है, तो उसके उदय के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारणों को समझने की आवश्यकता गौण हो जाती है। परिणामस्वरूप समाज समस्या के मूल कारणों पर विचार करने के बजाय नैतिक आक्रोश में उलझ जाता है। यह प्रवृत्ति मार्क्सवादी परंपरा के उस आग्रह से मेल खाती है, जहाँ इतिहास को संघर्षों की शृंखला मानकर वर्तमान को अनिवार्य संकट के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। किंतु इतिहास का अनुभव बताता है कि परिवर्तन केवल टकराव से नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार, नैतिक उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक संतुलन से भी संभव है।


ग्राम्शी स्वयं अपने समय के प्रति आशावादी थे। उन्होंने रूस में क्रांतिकारी उथल-पुथल देखी थी और विश्वास किया कि संघर्षों के बावजूद अंततः एक नई व्यवस्था उभरेगी। किंतु आज “राक्षसों का समय” का प्रयोग अक्सर निराशावादी भाव में होता है, मानो समाज किसी अंधकारमय गर्त में फँस गया हो। यह दृष्टिकोण नागरिकों को सक्रिय उत्तरदायित्व से दूर कर सकता है, क्योंकि जब हर समस्या को ऐतिहासिक अनिवार्यता या दैत्याकार शक्ति का परिणाम बताया जाए, तो व्यक्तिगत और सामूहिक नैतिक निर्णयों का महत्व घटने लगता है।


अंततः यह स्पष्ट है कि जिस कथन को व्यापक रूप से ग्राम्शी से जोड़ा जाता है, वह उनके मूल शब्दों का सरलीकृत और परिवर्तित रूप है। इस विकृति ने एक जटिल दार्शनिक विचार को लोकप्रिय नारे में बदल दिया। साथ ही यह भी दिखाता है कि मार्क्सवादी विचारधारा किस प्रकार प्रतीकों और संकट-कथाओं के माध्यम से अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने का प्रयास करती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम किसी भी विचारक को उद्धृत करने से पहले उसके वास्तविक संदर्भ को समझें और भावनात्मक रूपकों के बजाय तर्कपूर्ण विश्लेषण को प्राथमिकता दें। तभी हम संक्रमणकालीन चुनौतियों को “राक्षसों” के रूप में देखने के बजाय मानवीय निर्णयों और नीतिगत भूलों के परिणाम के रूप में समझ पाएँगे, और उनके समाधान के लिए अधिक संतुलित तथा उत्तरदायी मार्ग खोज सकेंगे।




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