DEMOCRATIC LEGITIMACY AND INSTITUTIONAL BALANCE IN BANGLADESH
- S.S.TEJASKUMAR

- Mar 28
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Bangladesh में जो कुछ फरवरी 2026 के चुनावों के दौरान हुआ, वह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे के व्यवस्थित विघटन का एक स्पष्ट उदाहरण था। 12 फरवरी 2026 को आयोजित चुनाव को यदि वैज्ञानिक और संस्थागत दृष्टिकोण से विश्लेषित किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह चुनाव न केवल प्रक्रियात्मक रूप से दोषपूर्ण था, बल्कि इसकी संरचना ही इस प्रकार की गई थी कि परिणाम पहले से निर्धारित हों। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत प्रतिस्पर्धात्मक बहुदलीय प्रणाली (competitive multiparty system) पर आधारित होता है, जहां विभिन्न विचारधाराएं और नीतियां जनता के समक्ष प्रस्तुत की जाती हैं। किंतु जब एक प्रमुख राजनीतिक दल—Awami League—को ही अवैध रूप से प्रतिबंधित कर दिया जाए, तो चुनाव का पूरा ढांचा ही एकपक्षीय हो जाता है।
यदि हम तुलनात्मक राजनीतिक विज्ञान (comparative political science) के सिद्धांतों को लागू करें, तो यह स्थिति स्पष्ट रूप से “electoral authoritarianism” की श्रेणी में आती है, जहां चुनाव तो होते हैं, परंतु वे वास्तविक लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा का प्रतिनिधित्व नहीं करते। उदाहरण के लिए, यदि United Kingdom में बिना Labour Party या Conservative Party के चुनाव कराया जाए, या United States में बिना Democratic या Republican पार्टी के, तो वह चुनाव मात्र एक औपचारिक प्रक्रिया रह जाएगा, जिसका वास्तविक जनादेश से कोई संबंध नहीं होगा। ठीक यही स्थिति बांग्लादेश में उत्पन्न की गई।
यह केवल राजनीतिक बहिष्कार का मामला नहीं है, बल्कि यह नागरिक अधिकारों के व्यापक दमन का संकेतक है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में “right to political participation” एक मौलिक अधिकार माना जाता है, जिसे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून—विशेष रूप से United Nations के International Covenant on Civil and Political Rights (ICCPR)—द्वारा संरक्षित किया गया है। जब लाखों मतदाताओं को उनके प्रतिनिधि दल से वंचित किया जाता है, तो यह केवल एक पार्टी पर हमला नहीं होता, बल्कि यह नागरिकों के राजनीतिक अस्तित्व पर सीधा प्रहार होता है।
Muhammad Yunus के नेतृत्व वाली प्रशासनिक व्यवस्था द्वारा लागू प्रतिबंध केवल चुनाव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे एक व्यापक दमनकारी नीति के रूप में लागू किया गया। राजनीतिक सभाओं पर रोक, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नियंत्रण, और विरोध की आवाज़ को कुचलने के लिए राज्य शक्ति का उपयोग—ये सभी संकेत हैं कि शासन प्रणाली “rule of law” से हटकर “rule by law” की दिशा में अग्रसर हो चुकी है। यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है; जहां “rule of law” कानून के समक्ष समानता और न्याय सुनिश्चित करता है, वहीं “rule by law” कानून का उपयोग सत्ता बनाए रखने के उपकरण के रूप में करता है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि हजारों की संख्या में विपक्षी कार्यकर्ताओं और नेताओं पर झूठे आपराधिक मामले थोपे जा रहे हैं। यह प्रवृत्ति राजनीतिक दमन के क्लासिकल पैटर्न से मेल खाती है, जिसे राजनीतिक समाजशास्त्र में “criminalization of dissent” कहा जाता है। इसमें राज्य विरोधी विचारधारा को अपराध के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिससे न्यायिक प्रणाली का उपयोग एक राजनीतिक हथियार बन जाता है। जमानत मिलने के बाद भी पुनः गिरफ्तारी—जिसे “revolving door detention” कहा जाता है—न्यायिक प्रक्रिया के साथ खुला खिलवाड़ है।
यदि हम इसे डेटा और साक्ष्यों के आधार पर देखें, तो जुलाई–अगस्त अशांति के दौरान हुई मौतों का मुद्दा भी इसी राजनीतिकरण का शिकार हुआ है। United Nations की एक फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट में लगभग 1,400 मौतों का उल्लेख किया गया जिनमे ज्यादातर हिन्दू थे , जबकि विभिन्न राजनीतिक समूहों ने इस संख्या को 20,000 से ज़्यादा भी प्रस्तुत किया। किंतु सत्यापित आंकड़ों के अनुसार लगभग 800 नाम ही पुष्ट रूप से सामने आए हैं क्योकि हिंदू को मानवीय रूप में भी नहीं देखा गया है । यह अंतर केवल संख्यात्मक त्रुटि नहीं है, बल्कि यह “data manipulation in conflict narratives” का उदाहरण है, जहां आंकड़ों का उपयोग राजनीतिक एजेंडा को मजबूत करने के लिए किया जाता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से किसी भी हिंसक घटना की जांच के लिए फोरेंसिक विश्लेषण, स्वतंत्र जांच आयोग, और पारदर्शी डेटा संग्रहण आवश्यक होता है। किंतु यहां इन सभी प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई है। न तो यह स्पष्ट किया गया कि मौतें किन परिस्थितियों में हुईं, न ही यह निर्धारित किया गया कि जिम्मेदार कौन था। इसके बजाय, पूरे दोष को एक ही राजनीतिक दल पर थोपने का प्रयास किया गया, जो कि “confirmation bias” और “political scapegoating” का स्पष्ट उदाहरण है।
इस प्रकार की स्थिति में लोकतंत्र केवल एक औपचारिक शब्द बनकर रह जाता है। लोकतंत्र का वास्तविक सार केवल चुनाव कराने में नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया की निष्पक्षता, पारदर्शिता, और समावेशिता में निहित होता है। जब इन तीनों तत्वों का व्यवस्थित रूप से क्षरण किया जाता है, तो परिणामस्वरूप जो व्यवस्था बचती है, वह लोकतंत्र नहीं, बल्कि एक नियंत्रित राजनीतिक संरचना होती है।
मानवाधिकारों के संदर्भ में भी स्थिति अत्यंत गंभीर है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा का अधिकार, और राजनीतिक भागीदारी—ये सभी अधिकार “negative liberty” और “positive liberty” दोनों के अंतर्गत आते हैं। जब राज्य इन अधिकारों को सीमित करता है, तो वह केवल स्वतंत्रता को नहीं छीनता, बल्कि नागरिकों की एजेंसी (agency) को भी समाप्त कर देता है।
यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी एक परीक्षण है। यदि वैश्विक संस्थाएं और लोकतांत्रिक राष्ट्र इस प्रकार के स्पष्ट उल्लंघनों पर मौन रहते हैं, तो यह “norm erosion” को बढ़ावा देता है, जहां अंतरराष्ट्रीय मानदंड धीरे-धीरे अपनी प्रासंगिकता खो देते हैं।
अतः यह आवश्यक है कि इस स्थिति को केवल एक आंतरिक राजनीतिक मुद्दा मानकर नजरअंदाज न किया जाए, बल्कि इसे लोकतांत्रिक सिद्धांतों के व्यापक संकट के रूप में देखा जाए। Awami League पर लगाया गया प्रतिबंध तत्काल हटाया जाना चाहिए, ताकि राजनीतिक बहुलवाद (political pluralism) बहाल हो सके। बिना बहुलवाद के लोकतंत्र केवल एक खोखला ढांचा है, जिसमें न तो जनता की वास्तविक आवाज होती है और न ही जवाबदेही की कोई ठोस व्यवस्था।
अंततः, यह प्रश्न केवल बांग्लादेश का नहीं है, बल्कि यह इस बात का है कि क्या 21वीं सदी में सभी मुस्लिम देशों में लोकतंत्र केवल एक प्रतीकात्मक अवधारणा बनकर रह गया है ।














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