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Black Chips

ISIS DIGITAL JIHAD: YOUTH UNDER SIEGE

“यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥”

“Where there is Krishna, the master of yoga, and where there is Arjuna, the supreme archer, there also are prosperity, victory, and sound morality.”

यह घटना केवल एक आपराधिक गिरफ्तारी की खबर नहीं है, बल्कि यह भारत की आंतरिक सुरक्षा, सामाजिक संरचना और डिजिटल युग में उभरती वैचारिक युद्ध प्रणाली का एक गंभीर संकेत है। 12 संदिग्धों की गिरफ्तारी, जिनका संबंध ISIS और Al-Qaeda जैसे वैश्विक आतंकी संगठनों से बताया जा रहा है, यह स्पष्ट करती है कि अब आतंकवाद केवल सीमाओं के पार से आने वाला खतरा नहीं रहा, बल्कि यह हमारे समाज के भीतर, हमारे युवाओं के दिमाग में, और हमारे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से जड़ें जमा रहा है। यह मामला और भी चिंताजनक इसलिए है क्योंकि इन लोगों ने एक साधारण गेमिंग ऐप के माध्यम से संपर्क स्थापित किया, जो यह दर्शाता है कि आधुनिक आतंकवादी नेटवर्क कितनी तेजी से और कितनी चतुराई से नई तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं।


इस पूरे प्रकरण में जो सबसे खतरनाक पहलू उभरकर सामने आता है, वह है “रैडिकलाइजेशन” की प्रक्रिया। यह कोई अचानक होने वाली घटना नहीं है, बल्कि यह एक वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक रूप से योजनाबद्ध प्रक्रिया है। मनोविज्ञान के अनुसार, जब किसी व्यक्ति को लगातार एक ही विचारधारा, एक ही प्रकार की सामग्री, और एक ही तरह के भावनात्मक उत्तेजनाओं के संपर्क में रखा जाता है, तो उसके मस्तिष्क में न्यूरल पाथवे (neural pathways) उसी दिशा में मजबूत होने लगते हैं। इसे “न्यूरोप्लास्टिसिटी” कहा जाता है। ISIS और Al-Qaeda जैसे संगठन इसी सिद्धांत का उपयोग करते हैं। वे युवाओं को पहले पहचान के संकट (identity crisis), फिर पीड़ित मानसिकता (victimhood narrative), और अंततः धार्मिक कर्तव्य (religious obligation) के नाम पर हिंसा के लिए तैयार करते हैं।


“Benex Com” जैसे समूहों का अस्तित्व इस बात का प्रमाण है कि यह कोई असंगठित या बिखरा हुआ नेटवर्क नहीं है, बल्कि एक सुव्यवस्थित डिजिटल इकोसिस्टम है। सोशल मीडिया पर भारत के राष्ट्रीय ध्वज को ISIS के झंडे से बदलना और राष्ट्रगान का मजाक उड़ाना केवल एक प्रतीकात्मक कृत्य नहीं है, बल्कि यह एक मनोवैज्ञानिक युद्ध (psychological warfare) का हिस्सा है। इसका उद्देश्य है—राष्ट्र की सामूहिक पहचान को कमजोर करना और युवाओं के मन में विद्रोह और अलगाव की भावना पैदा करना। यह वही तकनीक है जिसे “साइकोलॉजिकल ऑपरेशन्स” (PSYOPS) कहा जाता है, जिसका उपयोग युद्ध में दुश्मन के मनोबल को तोड़ने के लिए किया जाता है।


आंध्र प्रदेश के तीन आरोपियों द्वारा “Al Malik Islamic Youth” जैसे संगठन का गठन यह दर्शाता है कि यह खतरा केवल बाहरी नहीं है, बल्कि अब यह आंतरिक रूप से भी संगठित हो चुका है। यह लोग केवल विचारधारा फैलाने तक सीमित नहीं थे, बल्कि उन्होंने एक संरचित नेटवर्क तैयार किया, जिसमें अलग-अलग राज्यों के लोगों को जोड़ा गया। यह बिल्कुल उसी तरह का “सेल-आधारित नेटवर्क” (cell-based network) है, जिसका उपयोग आतंकवादी संगठन करते हैं ताकि यदि एक हिस्सा पकड़ा भी जाए, तो बाकी नेटवर्क सक्रिय बना रहे।


इन युवाओं का खुद को “मुझाहिदीन” के रूप में प्रस्तुत करना और ओसामा बिन लादेन की नकल करना यह दिखाता है कि यह केवल वैचारिक समर्थन नहीं है, बल्कि यह “हीरो वर्शिप” (hero worship) और “आइडेंटिटी इमिटेशन” (identity imitation) का मामला है। वैज्ञानिक रूप से देखा जाए तो यह “सोशल लर्निंग थ्योरी” (Albert Bandura) का उदाहरण है, जिसमें व्यक्ति दूसरों के व्यवहार को देखकर उसे अपनाता है। जब सोशल मीडिया पर आतंकवादियों को “हीरो” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो कुछ कमजोर मानसिकता वाले युवा उन्हें आदर्श मानने लगते हैं।


इस पूरे मामले में सबसे खतरनाक पहलू है—विदेशी हैंडलर्स के साथ संपर्क। “Al-Hakeem Shukur” जैसे विदेशी संपर्क यह साबित करते हैं कि यह कोई स्थानीय समस्या नहीं है, बल्कि यह एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का हिस्सा है। यह नेटवर्क “डिजिटल ब्रेनवॉशिंग” के माध्यम से युवाओं को पहले मानसिक रूप से तैयार करता है, फिर उन्हें प्रशिक्षण के लिए पाकिस्तान और अफगानिस्तान भेजने की योजना बनाता है। यह वही मॉडल है जो पहले भी कई आतंकी हमलों में देखा गया है, जहां पहले ऑनलाइन रैडिकलाइजेशन किया जाता है, फिर फिजिकल ट्रेनिंग दी जाती है, और अंत में उन्हें “स्लीपर सेल” के रूप में वापस भेज दिया जाता है।


अब सवाल यह उठता है कि आखिर युवा इस जाल में फंस क्यों रहे हैं? इसका उत्तर केवल धार्मिक या राजनीतिक नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारकों का मिश्रण है। बेरोजगारी, सामाजिक अलगाव, पहचान का संकट, और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अनियंत्रित सामग्री—ये सभी मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जिसमें रैडिकलाइजेशन आसान हो जाता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि 18-25 वर्ष की आयु के युवा सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं क्योंकि इस उम्र में उनका प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (prefrontal cortex), जो निर्णय लेने और नैतिकता से जुड़ा होता है, पूरी तरह विकसित नहीं होता। इसी कमजोरी का फायदा उठाकर आतंकवादी संगठन उन्हें अपने जाल में फंसाते हैं।


यह भी समझना जरूरी है कि यह केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है। यह एक “इन्फॉर्मेशन वॉरफेयर” (information warfare) है, जिसमें विचारधाराओं की लड़ाई हो रही है। यदि इसका मुकाबला केवल पुलिस कार्रवाई से किया जाएगा, तो यह अधूरा रहेगा। इसके लिए एक बहुआयामी रणनीति की जरूरत है, जिसमें साइबर मॉनिटरिंग, मनोवैज्ञानिक काउंटर-नैरेटिव, शिक्षा प्रणाली में सुधार, और सामाजिक जागरूकता शामिल हो।


When minds are invaded before borders are crossed, the war is already inside

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में, जहां अलग-अलग धर्म, भाषाएं और संस्कृतियां सह-अस्तित्व में हैं, वहां इस तरह की कट्टरपंथी विचारधारा एक जहर की तरह काम करती है। यह न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है, बल्कि यह सामाजिक ताने-बाने को भी तोड़ने का प्रयास है। इसलिए इस समस्या को केवल “आतंकवाद” के रूप में नहीं, बल्कि “वैचारिक संक्रमण” (ideological infection) के रूप में देखना होगा।


अंततः, यह घटना एक चेतावनी है। यह बताती है कि युद्ध अब सीमाओं पर नहीं, बल्कि दिमागों के भीतर लड़ा जा रहा है। यदि हम इस खतरे को समझने में देर करेंगे, तो यह हमारे समाज की जड़ों को कमजोर कर सकता है। इसलिए आवश्यक है कि हम न केवल सुरक्षा एजेंसियों को मजबूत करें, बल्कि अपने युवाओं को वैज्ञानिक सोच, तार्किक विश्लेषण और राष्ट्रीय चेतना से भी सशक्त बनाएं, ताकि वे किसी भी प्रकार के रैडिकल प्रोपेगेंडा का शिकार न बनें।



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