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NATIONAL SECURITY VS. NARRATIVE MANIPULATION: AZAD ESSA



भारत जैसे संप्रभु राष्ट्र के लिए यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि आधुनिक युग में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता, बल्कि यह डिजिटल स्पेस, मीडिया नैरेटिव्स और अकादमिक विमर्श के माध्यम से भी संचालित होता है। अज़ाद एसा जैसे व्यक्तियों के संदर्भ में यह प्रश्न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सूचना-युद्ध और संप्रभुता की रक्षा का है। एसा, जो Middle East Eye से जुड़े हुए हैं और पहले Al Jazeera के साथ कार्य कर चुके हैं, लगातार ऐसे लेखन और डिजिटल कंटेंट का उत्पादन करते रहे हैं जिसमें भारत की नीतियों, विशेषकर जम्मू-कश्मीर से संबंधित निर्णयों को एक व्यवस्थित नकारात्मक फ्रेम में प्रस्तुत किया जाता है। यह आलोचना अपने आप में समस्या नहीं है—लोकतंत्र में आलोचना आवश्यक है—लेकिन जब यह आलोचना बार-बार एक ही वैचारिक दिशा में झुकी हुई हो, चयनात्मक तथ्यों पर आधारित हो, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को कमजोर करने वाले नैरेटिव्स को amplify करे, तब यह एक बड़े सूचना-इकोसिस्टम का हिस्सा प्रतीत होने लगता है।

एसा की पुस्तक “Hostile Homelands” में भारत और इज़राइल के बीच एक समानता स्थापित करने का प्रयास किया गया है , जिसमें भारत को एक “settler-colonial state” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह विश्लेषण न केवल ऐतिहासिक रूप से विवादास्पद है, बल्कि यह भारत की संवैधानिक संरचना, लोकतांत्रिक संस्थाओं और संघीय ढांचे की अनदेखी भी करता है। भारत का जम्मू-कश्मीर सिर्फ़ एक राज्य नहीं है बल्कि टेक्टोनिक प्लेटो की टक्कर और सिंधु सभ्यता के जन्म से लेकर विधिसम्मत विलय (Instrument of Accession) पर आधारित एकरूप है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चुनौती नहीं दी जा सकती है। इसके बावजूद, यदि किसी पत्रकार द्वारा बार-बार इस संबंध को औपनिवेशिक कब्जे के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो यह केवल एक वैकल्पिक दृष्टिकोण नहीं रह जाता, बल्कि यह एक ऐसा नैरेटिव बन जाता है जो भारत की संप्रभुता को वैचारिक रूप से चुनौती देता है।वास्तव में इजराइल और भारत का एक ही संबंध है "परिपक्व गाढ़ मित्रता " जो अटूट है।

इस पूरे परिप्रेक्ष्य को और गहराई से समझने के लिए एसा के नेटवर्क को देखना आवश्यक है। उनका संबंध Hafsa Kanjwal से है, जो Lafayette College में कार्यरत हैं और जिन्होंने कश्मीर को “colonized territory” के रूप में प्रस्तुत किया है। यह दृष्टिकोण पश्चिमी अकादमिक जगत के कुछ हिस्सों में लोकप्रिय हो सकता है, लेकिन इसे भारत के संवैधानिक और ऐतिहासिक संदर्भ में लागू करना एक अत्यधिक सरलीकरण है। कंजवाल के शुरुआती संबंध Syed Ghulam Nabi Fai से रहे हैं, जिनका नाम अमेरिकी न्याय विभाग के रिकॉर्ड में ISI-समर्थित लॉबिंग गतिविधियों के संदर्भ में सामने आया था। यह तथ्य इस बात की ओर संकेत करता है कि कश्मीर मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय विमर्श केवल अकादमिक नहीं, बल्कि रणनीतिक और राजनीतिक भी है।

“Stand With Kashmir” जैसे संगठनों के माध्यम से इस नैरेटिव को वैश्विक स्तर पर फैलाया गया है। यह संगठन स्वयं को मानवाधिकारों के पक्षधर के रूप में प्रस्तुत करता है, लेकिन इसके कई दावे विवादित रहे हैं और इन्हें लेकर विभिन्न फैक्ट-चेकिंग संस्थाओं ने सवाल उठाए हैं। इसी प्रकार, Indian American Muslim Council जैसे मंचों पर एसा की सक्रियता यह दर्शाती है कि यह केवल व्यक्तिगत पत्रकारिता नहीं, बल्कि एक संगठित विमर्श का हिस्सा है, जहाँ भारत के खिलाफ एक विशिष्ट धारणा को स्थापित करने का प्रयास किया जाता है।

यहाँ यह समझना महत्वपूर्ण है कि किसी भी राष्ट्र के लिए “freedom of expression” और “freedom to influence” के बीच अंतर करना आवश्यक होता है। जब अभिव्यक्ति का उपयोग इस प्रकार किया जाता है कि वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश की संप्रभुता, आंतरिक स्थिरता और सामाजिक संतुलन को प्रभावित करे, तब राज्य के पास हस्तक्षेप करने का वैध अधिकार होता है। भारत का संविधान स्वयं अनुच्छेद 19(2) के तहत यह स्पष्ट करता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और संप्रभुता के हित में सीमित किया जा सकता है।

डिजिटल युग में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर नैरेटिव्स अत्यंत तेजी से फैलते हैं। MIT के शोध के अनुसार, भ्रामक जानकारी सच्ची जानकारी की तुलना में अधिक तेजी से वायरल होती है। ऐसे में यदि कोई प्रभावशाली पत्रकार लगातार एकतरफा या विवादित नैरेटिव को बढ़ावा देता है, तो उसका प्रभाव केवल विचारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह नीति-निर्माण, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और यहां तक कि जमीनी स्तर पर सामाजिक तनाव को भी प्रभावित कर सकता है।

इस संदर्भ में, अज़ाद एसा के X अकाउंट पर भारत में प्रतिबंध को केवल “censorship” कहना एक अधूरा और भ्रामक विश्लेषण है। यह एक ऐसा निर्णय है जिसे डिजिटल संप्रभुता, सूचना-सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझा जाना चाहिए। दुनिया के लगभग सभी लोकतांत्रिक देश—चाहे वह अमेरिका हो, यूरोप हो या ऑस्ट्रेलिया—डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर ऐसे ही नियंत्रण लागू करते हैं जब उन्हें लगता है कि कोई कंटेंट राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।

अंततः, यह मुद्दा किसी एक व्यक्ति या एक अकाउंट का नहीं है, बल्कि यह उस बड़े संघर्ष का हिस्सा है जिसमें राष्ट्र अपने नैरेटिव, अपनी संप्रभुता और अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि की रक्षा करने की कोशिश कर रहे हैं। अज़ाद एसा,ध्रुव राठी, अरफ़ा, अभिलाष, रवीश कुमार etc ... जैसे व्यक्तियों की भूमिका को इसी व्यापक संदर्भ में देखना होगा—जहाँ पत्रकारिता, एक्टिविज्म और भू-राजनीतिक रणनीति के बीच की रेखाएँ धुंधली होती जा रही हैं। भारत जैसे राष्ट्र के लिए यह अनिवार्य है कि वह केवल सैन्य या आर्थिक शक्ति के माध्यम से नहीं, बल्कि सूचना और नैरेटिव के स्तर पर भी अपनी स्थिति को मजबूत बनाए।


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