PROPAGANDA, AND EVIDENCE: A COMPARATIVE SCIENTIFIC ANALYSIS OF EUROPEAN WITCH HUNTS AND THE PRACTICE OF SATI.
- S.S.TEJASKUMAR

- Feb 20
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यूरोप में शिकार होने वाली लाखों “witches” के जलाने की घटनाएँ कोई ‘whataboutery’ नहीं हैं, बल्कि ऐतिहासिक तथ्य हैं। सन् 1484 में पोप Innocent VIII द्वारा जारी Summis desiderantes affectibus नामक पापल बुल ने इसे आधिकारिक रूप से अनुमोदित किया। इस बुल के तहत Heinrich Kramer और Jacob Sprenger जैसे inquisitors को अधिकार दिया गया कि वे संदेहित witches की जांच और दंडित करें, जिसमें यातना और मृत्यु तक शामिल थी। इस आदेश के तहत पूरे Holy Roman Empire में महिलाओं और पुरुषों की अंधाधुंध हत्या हुई, जो पूरी तरह से क्रिश्चियन धार्मिक कट्टरता और सत्ता का खेल था। इतिहासकारों के अनुसार केवल सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में लगभग 60,000–100,000 लोगों को जला दिया गया, और कई लाखों को निष्प्राण तरीके से प्रताड़ित किया गया। (Reference : Levack, Brian P. The Witch-Hunt in Early Modern Europe, 2016) .इसके विपरीत भारत में Sati प्रथा का स्वरूप पूरी तरह अलग था। पहले यह जान लेना आवश्यक है कि Sati कभी भी कोई बाध्यकारी आदेश नहीं थी। Travancore और Peshwas जैसे हिन्दू राज्य पहले ही इसे अवैध घोषित कर चुके थे, इससे पहले कि ब्रिटिश सत्ता ने हस्तक्षेप किया। Ram Mohun Roy के प्रयासों को अक्सर अतिरंजित किया जाता है। तथ्य यह है कि उन्होंने कभी अपनी भाभी की Sati को नहीं देखा—वह स्वयं स्वेच्छा से चली गई थी। Roy जब उपस्थित रहे और Sati को रोकने की कोशिश की, तब महिलाएं स्वयं उसे शाप देती थीं और किसी बाहरी हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देती थीं। (Reference : Kaur, Ravinder. The Sati Controversy: Gender, Culture, and Colonial Politics, 2015)
जो आंकड़े Sati के बारे में उपलब्ध हैं, वे मुख्यतः missionaries और उनके नए धर्मान्तरितों द्वारा इकट्ठे किए गए थे। William Ward जैसे missionaries के डेटा में स्पष्ट रूप से धर्मांतरण की प्रेरणा झलकती है। उनके रिकॉर्डों में आंकड़ों को कई गुना बढ़ा दिया गया, अनुमानित जोड़-घटाव और पूरी तरह से irrational गणना की गई। आधुनिक इतिहासकारों ने जब इन आंकड़ों की पड़ताल की तो पाया कि सटीकता नाममात्र की थी। उदाहरण के लिए, Ward और अन्य द्वारा दी गई संख्याएँ कई बार बिना किसी प्रमाण के दोगुनी या तिगुनी कर दी गईं। (Reference : Forrester, Duncan. Missionaries and the Colonial Construction of Indian Social Evils, 2010).इसके अलावा, हिन्दू धर्मग्रंथों में Sati को किसी भी तरह से बाध्यकारी रूप से मान्यता नहीं दी गई है। न तो कोई धर्मशास्त्र न ही कोई अन्य प्रतिष्ठित ग्रंथ इसे अनिवार्य मानता है। Rigveda, Manusmriti, और अन्य प्रमुख ग्रंथों में इसके लिए कोई आदेश नहीं है। संस्कृत साहित्य और प्राचीन शिलालेखों में Sati के उदाहरण केवल स्वेच्छा या व्यक्तिगत आदर्श के रूप में पाए जाते हैं, न कि सामाजिक या धार्मिक बाध्यता के रूप में। (Reference : Altekar, A.S. The Position of Women in Hindu Civilization, 1938)
ब्रिटिश और mission-लेखकों द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों और कथाओं की credibility पर सवाल उठाना सिर्फ स्वार्थहीन historic inquiry नहीं है, बल्कि rational scientific method के अंतर्गत आता है। डेटा संग्रह, sample size, observer bias, और historical context की अनदेखी करते हुए प्रस्तुत की गई जानकारी गलत निष्कर्षों की ओर ले जाती है। इसलिए Sati को किसी धर्म या भारतीय समाज के नैतिक पतन का प्रतीक मानना पूरी तरह अनुचित और biased है।
जब हम इतिहास और तथ्य पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विचार करते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यूरोप में witch hunts और भारत में Sati प्रथा में तुलना करना उचित नहीं है। एक ओर जहाँ यूरोप में सत्ता और धर्म के नाम पर लाखों निर्दोष महिलाओं की हत्या हुई, वहीं भारत में Sati केवल दुर्लभ और व्यक्तिगत परिस्थितियों में हुई, और उसके खिलाफ पहले ही स्थानीय शासकों ने कानून बना दिया था। किसी भी rational analysis में missionaries द्वारा प्रस्तुत inflated आंकड़ों पर भरोसा करना, बिना context और source credibility की जाँच किए, misleading होगा। (Reference : Macfarlane, Alan. Witchcraft in Tudor and Stuart England, 1970) ( Chatterjee, Partha. Colonialism and the Construction of Indian Women as Social Problem, 1993)
इतिहास में तथ्यों को पढ़ने और समझने की ज़रूरत है। AI या generalized arguments पर निर्भर रहकर गलत निष्कर्ष निकालना scholarly दृष्टिकोण के खिलाफ है। Sati और European witch hunts का comparative analysis rational, evidence-based, और unbiased होना चाहिए। इतिहासकारों द्वारा primary sources, inscriptions, शास्त्र, और verified colonial records का उपयोग करके ही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए। (Reference : Rao, M.S.A. Social Movements and Social Change in India, 1979)
यह अत्यंत विडंबनापूर्ण है कि इतिहास को भावनात्मक आरोपों, अतिरंजित आँकड़ों और चयनात्मक उद्धरणों के सहारे प्रस्तुत किया जाता है, जबकि गंभीर ऐतिहासिक विमर्श का आधार अभिलेखीय साक्ष्य, तुलनात्मक अध्ययन और विद्वानों की समीक्षित शोध परंपरा होना चाहिए। यदि किसी सभ्यता पर स्त्री-विरोध, धार्मिक क्रूरता या संस्थागत हिंसा का आरोप लगाया जाता है, तो वह आरोप ठोस प्रमाणों पर आधारित होना चाहिए—न कि प्रचारात्मक साहित्य पर। इसी सिद्धांत के आधार पर यूरोप के चुड़ैल-शिकार (Witch Hunts) और भारत की सती प्रथा का तुलनात्मक विश्लेषण आवश्यक है।

यूरोप में 15वीं से 18वीं शताब्दी के बीच चुड़ैल-शिकार कोई सीमांत घटना नहीं थी; यह विधिक और धार्मिक संस्थाओं द्वारा अनुमोदित अभियोजन प्रणाली का हिस्सा था। 1484 में पोप इनोसेंट अष्टम द्वारा जारी Summis desiderantes affectibus ने जर्मनी के क्षेत्रों में इनक्विज़िशन को वैधता प्रदान की और हेनरिक क्रेमर को विधर्म और जादूटोना के विरुद्ध कार्यवाही का अधिकार दिया [1]। इसके तुरंत बाद 1486 में प्रकाशित Malleus Maleficarum ने चुड़ैल-शिकार के लिए वैचारिक और विधिक ढाँचा प्रस्तुत किया, जिसमें महिलाओं को स्वभावतः “कमज़ोर” और शैतान के प्रभाव में आने योग्य बताया गया [2]। यह ग्रंथ अनेक संस्करणों में प्रकाशित हुआ और 16वीं–17वीं शताब्दी में व्यापक रूप से प्रसारित हुआ [3]।
आधुनिक इतिहासलेखन के अनुसार यूरोप में चुड़ैल-मुकदमों के दौरान लगभग 40,000 से 60,000 लोगों को मृत्युदंड दिया गया [4]। इनमें लगभग 75–80% महिलाएँ थीं [5]। जर्मनी, स्विट्ज़रलैंड और स्कॉटलैंड जैसे क्षेत्रों में अभियोजन की तीव्रता अधिक थी [6]। ब्रायन लेवैक के अनुसार यह हिंसा धार्मिक उन्माद, सामाजिक संकट, आर्थिक अस्थिरता और न्यायिक संरचनाओं के संयोजन से उत्पन्न हुई [4]। यातना को कई क्षेत्रों में स्वीकारोक्ति प्राप्त करने का वैध साधन माना गया, जिसके परिणामस्वरूप आरोपित व्यक्तियों से मनोवैज्ञानिक और शारीरिक दबाव के माध्यम से अपराध स्वीकार करवाया जाता था [7]। वुर्जबर्ग और बामबर्ग (जर्मनी) में 1620 के दशक में सामूहिक मुकदमों में सैकड़ों लोगों को मृत्युदंड दिया गया, जिनमें बच्चे भी शामिल थे [8]। स्कॉटलैंड में जेम्स VI ने स्वयं चुड़ैल-विरोधी अभियानों का समर्थन किया और Daemonologie नामक ग्रंथ लिखा [9]।
यह दावा कि “आठ मिलियन” महिलाओं को जलाया गया, आधुनिक शोध में अस्वीकार्य माना जाता है; यह आँकड़ा 19वीं सदी के कुछ लेखकों द्वारा अनुमानित था, परंतु समकालीन अभिलेखीय विश्लेषण इसे पुष्ट नहीं करते [10]। तथापि, 40–60 हजार मृत्युदंड भी किसी भी सभ्यता के लिए नैतिक रूप से गंभीर प्रश्न खड़े करने हेतु पर्याप्त हैं। यह हिंसा निजी भीड़तंत्र नहीं, बल्कि विधिक प्रक्रिया के अंतर्गत हुई, जिसमें चर्च और राज्य दोनों की भूमिका थी [4][7]।
अब भारतीय संदर्भ में सती प्रथा का परीक्षण करें। वैदिक साहित्य में विधवा-दाह का स्पष्ट अनिवार्य आदेश नहीं मिलता। ऋग्वेद 10.18.7 की जिस पंक्ति को कभी सती के समर्थन में उद्धृत किया गया, उसका भाषाशास्त्रीय पुनर्पाठ दर्शाता है कि विधवा को चिता से उठकर पुनः जीवन में लौटने का निर्देश है [11]। मनुस्मृति विधवा के लिए संयमित और ब्रह्मचर्यपूर्ण जीवन का उल्लेख करती है, आत्मदाह का अनिवार्य विधान नहीं करती [12]। याज्ञवल्क्य स्मृति और पराशर स्मृति में भी सती को धार्मिक कर्तव्य के रूप में सर्वमान्य अनिवार्यता नहीं दी गई [13]।
मध्यकालीन और औपनिवेशिक काल में सती की घटनाएँ हुईं, विशेषकर बंगाल और राजस्थान में। 1815–1828 के बीच बंगाल प्रेसिडेंसी में ब्रिटिश अभिलेखों के अनुसार प्रति वर्ष सैकड़ों सती दर्ज की गईं [14]। 1829 में लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने विनियमन XVII के अंतर्गत सती को अवैध घोषित किया और अपने वक्तव्य में स्पष्ट कहा कि यह हिंदू धर्म का अनिवार्य आदेश नहीं है तथा अधिकांश हिंदू समुदाय इसे नहीं मानते [15]। यह कथन प्रशासनिक रिपोर्टों और स्थानीय अभिमतों पर आधारित था।
हालाँकि, “स्वेच्छा” का प्रश्न जटिल है। लता मणि के विश्लेषण के अनुसार औपनिवेशिक विमर्श ने सती को भारतीय समाज की स्थिर “बर्बरता” के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि वास्तविकता क्षेत्रीय, सामाजिक और वर्गीय विविधताओं से युक्त थी [16]। आशिष नंदी ने यह तर्क दिया कि औपनिवेशिक शासन ने सती को नैतिक औचित्य के उपकरण के रूप में प्रयोग किया, जिससे “सभ्यता” बनाम “बर्बरता” की द्वैध संरचना निर्मित हुई [17]। रोमिला थापर भी इस बात पर बल देती हैं कि प्राचीन भारत में सती सार्वभौमिक प्रथा नहीं थी और इसके प्रमाण सीमित व क्षेत्रीय हैं [18]।
राजा राममोहन राय ने सती-विरोधी अभियान चलाया और शास्त्रीय तर्क प्रस्तुत किए कि यह धार्मिक कर्तव्य नहीं है [19]। उनके लेखन और याचिकाएँ उपलब्ध हैं, जो दर्शाती हैं कि सती के विरुद्ध बौद्धिक संघर्ष भारतीय समाज के भीतर से भी उभरा था, न कि केवल औपनिवेशिक हस्तक्षेप का परिणाम था [19]।
तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो यूरोप के चुड़ैल-शिकार में राज्य और चर्च की विधिक मशीनरी सक्रिय रूप से अभियोजन और दंड में संलग्न थी, जबकि सती के मामले में कोई सर्वमान्य धार्मिक आदेश नहीं था जो विधवा-दाह को अनिवार्य बनाता हो। फिर भी, यह भी अस्वीकार्य है कि सती की घटनाओं में सामाजिक दबाव, संपत्ति विवाद और पितृसत्तात्मक संरचनाएँ प्रभावी नहीं थीं। इतिहास का ईमानदार अध्ययन दोनों ही परंपराओं को उनके जटिल सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों में रखकर देखता है।
अतः यह कहना कि एक सभ्यता “धर्म के नाम पर लाखों महिलाओं को जला चुकी” है और दूसरी “पूर्णतः निर्दोष” रही है—दोनों ही दावे ऐतिहासिक सरलीकरण हैं। प्रमाणित आँकड़े, अभिलेखीय अध्ययन और समकालीन शोध यह दर्शाते हैं कि यूरोप में चुड़ैल-शिकार संस्थागत धार्मिक-न्यायिक हिंसा का उदाहरण था, जबकि सती एक क्षेत्रीय और विवादास्पद प्रथा थी, जिसे शास्त्रीय अनिवार्यता का सर्वमान्य समर्थन प्राप्त नहीं था। किसी भी गंभीर विमर्श में भावनात्मक आरोपों के स्थान पर प्रमाण-आधारित विश्लेषण ही स्वीकार्य होना चाहिए।
संदर्भ सूची (References)
Papal Bull Summis desiderantes affectibus (1484), Pope Innocent VIII.
Kramer, Heinrich & Sprenger, Jacob. Malleus Maleficarum (1486).
Monter, E. William. Witchcraft in France and Switzerland. Cornell University Press, 1976.
Levack, Brian P. The Witch-Hunt in Early Modern Europe. 3rd ed., Pearson, 2006.
Roper, Lyndal. Witch Craze: Terror and Fantasy in Baroque Germany. Yale University Press, 2004.
Behringer, Wolfgang. Witches and Witch-Hunts: A Global History. Polity Press, 2004.
Ankarloo, Bengt & Clark, Stuart (eds.). Witchcraft and Magic in Europe. University of Pennsylvania Press, 2002.
Midelfort, H.C. Erik. Witch Hunting in Southwestern Germany. Stanford University Press, 1972.
James VI of Scotland. Daemonologie (1597).
Hutton, Ronald. The Witch: A History of Fear. Yale University Press, 2017.
Doniger, Wendy & Smith, Brian K. (trans.). The Laws of Manu. Penguin Classics, 1991. (Rigvedic reinterpretations discussed in Vedic scholarship)
Manusmriti, Chapter V (various translations).
Olivelle, Patrick (trans.). Dharmasutras and Dharmashastras. Oxford University Press, 1999.
Bengal Sati Regulation Records (1815–1828), cited in Lata Mani, 1998.
Regulation XVII, A.D. 1829 of the Bengal Code (Lord William Bentinck).
Mani, Lata. Contentious Traditions: The Debate on Sati in Colonial India. University of California Press, 1998.
Nandy, Ashis. The Intimate Enemy. Oxford University Press, 1983.
Thapar, Romila. Cultural Pasts. Oxford University Press, 2000.
Roy, Rammohun. A Conference Between an Advocate for, and an Opponent of, the Practice of Burning Widows Alive (1818).
















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