BLOWBACK IN GILGIT-BALTISTAN: PAKISTAN’S MILITANT STRATEGY TURNING INWARD
- S.S.TEJASKUMAR

- Mar 18
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यह घटना—यदि दारेल, दीमेर (गिलगित-बाल्टिस्तान) में कथित हमले का दावा तथ्यात्मक रूप से सही है—तो इसे किसी भी प्रकार की “आज़ादी की लड़ाई” के रूप में प्रस्तुत करना न केवल बौद्धिक बेईमानी है, बल्कि यह उस गहरे और लंबे समय से पल रहे संरचनात्मक संकट को छुपाने का प्रयास भी है, जिसकी जड़ें पाकिस्तान की स्वयं की सुरक्षा और सामरिक नीतियों में गहराई तक धंसी हुई हैं। यह घटना किसी मुक्ति आंदोलन का प्रमाण नहीं है; यह उस ‘ब्लोबैक’ का साक्ष्य है जिसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों और सुरक्षा अध्ययन में बार-बार समझाया गया है—कि जब कोई राज्य अपने रणनीतिक हितों के लिए उग्रवाद को एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल करता है, तो वह अंततः उसी राज्य की स्थिरता को खा जाता है।
पाकिस्तान ने दशकों तक “अच्छे आतंकवादी” और “बुरे आतंकवादी” का एक कृत्रिम विभाजन बनाए रखा। यह विभाजन कभी वास्तविक नहीं था; यह केवल एक रणनीतिक भ्रम था, एक अस्थायी औजार, जिसके माध्यम से राज्य ने अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को साधने का प्रयास किया। परंतु उग्रवादी पारिस्थितिकी तंत्र (militant ecosystems) किसी प्रयोगशाला के नियंत्रित रसायन नहीं होते। वे जीवित, अनुकूलनशील और स्वायत्त नेटवर्क होते हैं, जो समय के साथ अपनी दिशा, संरचना और लक्ष्य बदलते रहते हैं। जब इन्हें वैचारिक ईंधन, वित्तीय संसाधन और सुरक्षित आश्रय मिलता है, तो वे केवल सीमाओं के पार ही नहीं, बल्कि अपने ही स्रोत की ओर भी वापस मुड़ते हैं।
इसी संदर्भ में 2025 में “इत्तेहाद-उल-मुजाहिदीन पाकिस्तान (IMP)” का उभरना कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह एक प्राकृतिक विकास है—एक ऐसा समेकन (consolidation) जिसमें विभिन्न उग्रवादी संगठनों ने अपने हितों, संसाधनों और रणनीतियों को एकीकृत किया। इसमें हाफिज गुल बहादुर समूह, लश्कर-ए-इस्लाम और हरकत इन्किलाब-ए-इस्लामी पाकिस्तान जैसे संगठनों का शामिल होना यह स्पष्ट करता है कि यह कोई बिखरी हुई या सीमांत समस्या नहीं है, बल्कि एक संगठित, बहु-स्तरीय और परिपक्व उग्रवादी नेटवर्क का निर्माण हो चुका है। यह वही बिंदु है जहाँ राज्य की “प्रॉक्सी युद्ध” की नीति अपने ही ढांचे को नष्ट करने लगती है।
वैज्ञानिक और सुरक्षा अध्ययन के दृष्टिकोण से देखें तो यह एक क्लासिक केस है “नॉन-स्टेट एक्टर्स के अनियंत्रित उत्क्रांत (uncontrolled evolution)” का। जब किसी राज्य द्वारा समर्थित या सहन किए गए सशस्त्र समूहों को समय के साथ वैचारिक स्वायत्तता मिल जाती है, तो वे अपने मूल प्रायोजक के हितों से अलग हो जाते हैं। इस प्रक्रिया को नेटवर्क सिद्धांत (network theory) और जटिल प्रणाली विज्ञान (complex systems science) के माध्यम से समझा जा सकता है, जहाँ छोटे-छोटे नोड्स (उग्रवादी समूह) आपस में जुड़कर एक बड़े, लचीले और अनुकूलनशील नेटवर्क का निर्माण करते हैं। यह नेटवर्क केंद्रीकृत नियंत्रण से बाहर होता है और अपनी स्वयं की गतिशीलता विकसित करता है।
ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स 2025 के आंकड़े इस वास्तविकता को और अधिक स्पष्ट करते हैं। पाकिस्तान को दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आतंकवाद-प्रभावित देश बताया गया, और 2024 में आतंकवादी घटनाओं में मृत्यु दर में 45% की वृद्धि दर्ज की गई। यह वृद्धि कोई संयोग नहीं है; यह उस लंबे समय से चल रहे संरचनात्मक असंतुलन का परिणाम है, जिसे राज्य ने स्वयं पोषित किया। रिपोर्टों के अनुसार, केवल तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) ही 2024 में आतंकवाद से संबंधित 52% मौतों के लिए जिम्मेदार था। यह आंकड़ा इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि समस्या अब सीमित या बाहरी नहीं रही; यह पूरी तरह आंतरिक हो चुकी है।
दीमेर क्षेत्र में अगस्त 2025 में हुए हमले—जहाँ गिलगित-बाल्टिस्तान स्काउट्स के एक चेकपोस्ट पर हमला कर दो जवानों की हत्या कर दी गई—इस प्रवृत्ति का स्पष्ट संकेत है। यह कोई अलग-थलग घटना नहीं थी; यह एक पैटर्न का हिस्सा थी, जिसमें उग्रवादी समूह लगातार उन क्षेत्रों को निशाना बना रहे हैं जिन्हें पहले अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता था। इन हमलों की जिम्मेदारी TTP द्वारा लेना यह दर्शाता है कि ये नेटवर्क अब केवल सीमावर्ती इलाकों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे उन क्षेत्रों में भी सक्रिय हो रहे हैं जो पाकिस्तान के सामरिक और भौगोलिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
गिलगित-बाल्टिस्तान का महत्व केवल भौगोलिक नहीं है; यह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का एक केंद्रीय हिस्सा है। इस क्षेत्र में अस्थिरता का अर्थ है न केवल आंतरिक सुरक्षा का संकट, बल्कि अंतरराष्ट्रीय निवेश और रणनीतिक साझेदारियों पर भी गंभीर प्रभाव। जब ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में उग्रवादी गतिविधियाँ बढ़ती हैं, तो यह स्पष्ट संकेत होता है कि राज्य की सुरक्षा संरचना में गहरे स्तर पर विफलता है।
यहाँ एक और महत्वपूर्ण वैज्ञानिक दृष्टिकोण लागू होता है—“ब्लोबैक थ्योरी”। यह सिद्धांत बताता है कि जब कोई राज्य गुप्त या अप्रत्यक्ष रूप से हिंसक समूहों को समर्थन देता है, तो उन कार्रवाइयों के अप्रत्याशित और अक्सर नकारात्मक परिणाम अंततः उसी राज्य को प्रभावित करते हैं। अफगानिस्तान में 1980 के दशक के दौरान मुजाहिदीन को समर्थन देने के बाद अमेरिका ने जिस प्रकार अल-कायदा के रूप में ब्लोबैक का सामना किया, उसी प्रकार पाकिस्तान अब अपने ही बनाए हुए नेटवर्क्स के परिणाम भुगत रहा है।
गिलगित-बाल्टिस्तान के लोगों के लिए यह स्थिति और भी अधिक त्रासद है। यह क्षेत्र पहले से ही संवैधानिक अस्पष्टता, राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी और आर्थिक पिछड़ेपन से जूझ रहा है। यहाँ के लोगों को सड़कों, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता है, न कि सैन्यीकरण और उग्रवादी हिंसा की। परंतु जब राज्य की प्राथमिकताएँ सुरक्षा और नियंत्रण तक सीमित हो जाती हैं, तो नागरिक अधिकार और विकास पीछे छूट जाते हैं।
यह कहना कि उग्रवादी हमले किसी प्रकार से स्थानीय लोगों के अधिकारों के लिए संघर्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं, एक खतरनाक और भ्रामक तर्क है। इतिहास और सामाजिक विज्ञान दोनों यह स्पष्ट करते हैं कि सशस्त्र संघर्ष शायद ही कभी स्थायी शांति या न्याय की ओर ले जाते हैं। इसके विपरीत, वे अक्सर और अधिक हिंसा, अस्थिरता और दमन को जन्म देते हैं। गिलगित-बाल्टिस्तान में भी यही हो रहा है—जहाँ नागरिक एक ओर राज्य की कड़ी सुरक्षा नीतियों और दूसरी ओर उग्रवादी समूहों के बीच फंसे हुए हैं।
पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि वह इस स्थिति को कैसे संबोधित करता है। क्या वह अब भी “अच्छे” और “बुरे” आतंकवादियों के पुराने और विफल सिद्धांत से चिपका रहेगा, या वह एक व्यापक और ईमानदार आत्ममंथन करेगा? क्या वह अपने अतीत की नीतियों की जिम्मेदारी लेगा, या फिर हर नई घटना को एक अलग, असंबद्ध समस्या के रूप में प्रस्तुत करता रहेगा?
वास्तविकता यह है कि जब तक राज्य अपने भीतर मौजूद उग्रवादी पारिस्थितिकी तंत्र को समाप्त करने के लिए ठोस और निरंतर प्रयास नहीं करता, तब तक यह समस्या केवल बढ़ती ही जाएगी। इसके लिए केवल सैन्य कार्रवाई पर्याप्त नहीं है; इसके लिए वैचारिक, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर भी व्यापक सुधारों की आवश्यकता है। शिक्षा प्रणाली में सुधार, कट्टरपंथी विचारधाराओं का प्रतिरोध, और राजनीतिक समावेशन जैसे कदम आवश्यक हैं।
अंततः, यह स्थिति शक्ति का नहीं, बल्कि कमजोरी का संकेत है। एक मजबूत राज्य वह होता है जो अपने नागरिकों को सुरक्षा, न्याय और अवसर प्रदान करता है। एक ऐसा राज्य जो अपने ही बनाए हुए नेटवर्क्स से जूझ रहा हो, वह अपनी ही नीतियों का शिकार बन चुका होता है। गिलगित-बाल्टिस्तान में जो हो रहा है, वह उसी विफलता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
संदर्भ:
[1] Global Terrorism Index 2025 Report
[2] Dawn News Analysis on Terrorism Trends in Pakistan (2025)
[3] South Asia Terrorism Portal (SATP) Data Archives
[4] International Crisis Group Reports on Pakistan Security Dynamics
[5] Network Theory and Complex Systems in Security Studies (Academic Papers)














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